
जौनपुर भाजपा के बरिष्ठ नेता एवं समाज सेवी ज्ञान प्रकाश सिंह नेतृत्व मे बी आर पी इंटर कॉलेज मे हो रही नव दिवसीय आज छटवें दीं आचार्य शांतनु महाराज ने कैकई के चित्रण करते हुए कहा की ज़ब राजा राम को तिलक और राजगद्दी की तैयारी चल रहा था तब मंथरा राजमहल जा क़र बताया की रानी राजा कभी कैकेयी को दो वरदान देने का वचन दिया था। उसने इसी ने सलाह दी कि कैकेयी कोपभवन में जाकर बैठ जाएँ और राजा दशरथ से अपने दोनों वरदान माँगें—पहला वरदान: भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए।दूसरा वरदान: श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास दिया जाए।मंथरा ने कैकेयी को विश्वास दिलाया कि यही उनके और भरत के भविष्य की सुरक्षा का एकमात्र रास्ता है। धीरे-धीरे कैकेयी उसके बहकावे में आ गईं और कोपभवन में जाकर बैठ गईं।जब राजा दशरथ वहाँ पहुँचे और कैकेयी की नाराजगी का कारण पूछा, तो उन्होंने अपने वचन की याद दिलाते हुए दोनों वरदान माँग लिए। कैकेयी की माँग सुनकर राजा दशरथ स्तब्ध रह गए। वे श्रीराम से अत्यंत प्रेम करते थे और उन्हें वनवास भेजने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे, लेकिन वचनबद्ध होने के कारण गहरे संकट में पड़ गए।कैकेयी ने पहला वरदान मांगा कि उनके पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए और दूसरा वरदान मांगा कि भगवान श्रीराम को चौदह वर्ष के लिए वनवास भेज दिया जाए।यह सुनते ही महाराज दशरथ स्तब्ध रह गए। जिस पुत्र को वे अपने जीवन का आधार मानते थे, उसी को वनवास देने की बात उनके हृदय को चीर गई। उन्होंने कैकेयी को समझाने का प्रयास किया, लेकिन कैकेयी अपने वरदानों पर अडिग रहीं।राजसी त्यागकर वनवासी वेश में आए प्रभु श्रीराम जब चौदह वर्ष के वनवास पर जाने का निश्चय किया, तो उन्होंने राजसुख और वैभव का त्याग कर दिया। उनके लिए न सिंहासन का मोह था और न महल की सुख-सुविधाओं की k की रक्षा ही उनके लिए सबसे बड़ा धर्म था।माता सीता ने भी श्रीराम के साथ वन जाने का दृढ़ निश्चय किया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि पति के बिना राजमहल का सुख उनके लिए अर्थहीन है। वे हर परिस्थिति में अपने पति का साथ निभाना चाहती थीं। लक्ष्मण जी ने भी अपने बड़े भाई की सेवा करने और उनकी रक्षा के लिए वन जाने का संकल्प लिया।इस प्रकार तीनों ने राजमहल के सुखों को पीछे छोड़कर कठिन वन-जीवन की ओर कदम बढ़ाने की तैयारी की।माता कौशल्या की आंखों से बहने लगे आंसूजब माता कौशल्या को ज्ञात हुआ कि उनके प्रिय पुत्र श्रीराम वन जाने वाले हैं, तो उनका हृदय व्याकुल हो उठा। जिस पुत्र को उन्होंने बड़े स्नेह से पाला-पोसा था, उसे चौदह वर्षों के लिए अपने से दूर जाते देखना उनके लिए अत्यंत कठिन था।माता कौशल्या ने श्रीराम को अपने हृदय से लगाया। मां और पुत्र के बीच का वह भावुक क्षण मानो पूरे राजमहल के दुख को अपने भीतर समेटे हुए था। श्रीराम ने अपनी माता को सांत्वना दी औरज़ब राम सीता लक्मण तीनों वन-वन भटकते हुए जब गंगा नदी के पवित्र तट पर पहुँचे, तो वहाँ का वातावरण अत्यंत शांत और मनोहारी था। गंगा की लहरें कल-कल करके बह रही थीं। माता सीता और लक्ष्मण के साथ प्रभु श्रीराम ने गंगा मैया को प्रणाम किया। अब गंगा पार करके पड़ी, जिसका नाम केवट था। भगवान ने उसे अपने पास बुलाया और विनम्रता से कहा—श्रीराम: “हे भाई केवट! हमें गंगा नदी के उस पार जाना है। कृपा करके अपनी नाव से हमें पार पहुँचा दो।भगवान श्रीराम की वाणी सुनकर केवट ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। वह प्रभु को पहचान चुका था, लेकिन उसने तुरंत नाव आगे नहीं बढ़ाई। वह मन ही मन विचार करने लगा कि जिनके चरणों की धूल से पत्थर भी नारी बन सकता है, यदि उनके चरण मेरी नाव पर पड़ गए तो कहीं मेरी नाव भी किसी अन्य रूप में न बदल जाए!केवट ने बड़ी विनम्रता से कहा—केवट: “प्रभु! आपकी बात तो मैं अवश्य मानूँगा, लेकिन मेरी एक छोटी-सी विनती है। मैंने आपके चरणों की महिमा सुनी है। आपके चरणों की धूल से पत्थर तक सुंदर नारी बन गया था। मेरी नाव तो लकड़ी की बनी है। यदि आपके चरणों की धूल इसे भी कुछ और बना देगी, तो मेरा परिवार कैसे चलेगा? मेरी आजीविका का एकमात्र साधन यही नाव है।”केवट की बात सुनकर लक्ष्मण जी को आश्चर्य हुआ, लेकिन प्रभु श्रीराम मंद-मंद मुस्कुराने लगे। भगवान समझ गए कि केवट के मन में कोई स्वार्थ नहीं, बल्कि अपने आराध्य के चरणों की सेवा पाने की अद्भुत लालसा है।श्रीराम: “हे केवट! तुम जैसा उचित समझो, वैसा करो। हमें तो केवल गंगा पार पहुँचना है।”तब केवट ने हाथ जोड़कर कहा—केवट: “प्रभु! मेरी एक ही शर्त है। पहले मैं आपके चरणों को अपने हाथों से धोऊँगा, उसके बाद ही आपको नाव पर बैठाऊँगा।”तब श्री राम केवट की सारी बात मन ली इस कथा का श्रवण पान करने के लिए प्रमुख अतिथि लोग विद्यमान रहे ओम प्रकाश राजभर, पंचायत राज्य मंत्री उ प्र सरकार, सुशील सिंह विधायक सैयद राजा, डॉ हरेंद्र देव सिंह पूर्व विधायक जफराबाद, बंश raj सिंह प्रमुख सिरकोनी ब्लॉक, अवधेश सिंह विधयाक पिंडरा वाराणसी, डॉ जे पी सिंह टी डी कॉलेज, अनुज सिंह गोधना, भुनेश्वर सिंह दीपक सिंह,शिवा सिंह,सुनील सिंह आदि गणमान्य लोग उपस्थिति रहे


