किसान भाई भूमिशोधन/बीजशोधन अवश्य करें     


    जौनपुर–जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने अवगत कराया है कि बीज जनित/भूमिजनित रोगों से आगामी बोई जाने वाली फसल के बचाव हेतु बीजशोधन का अत्यधिक महत्व है। ”बीजशोधन” द्वारा फसल की रोगों से सुरक्षा कर अधिक पैदावार ली जा सकती है जिससे कृषकों की आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ होगी।
      इसी प्रकार अनेक प्रमुख कीटों की प्रावस्थाये व भूमिजनित रोगों के कारक भूमि में पाये जाते हैं जो फसलों को विभिन्न प्रकार से क्षति पहुचाते हैं प्रमुख रूप से दीमक, सफेद गिडार, कटवर्म, सूत्रकृमि लेपीडाप्टेरस आदि अनेक कीटों तथा फफूॅदी/जीवाणु रोगों के भी भूमि जनित कारक प्रावस्थायें भूमि की संरचना के अनुरूप मिट्टी मे पाये जाते हैं,जो अनुकूल परिस्थितियों में पौधे की विभिन्न प्रावस्थाओं को संक्रमित कर फसल उत्पादन में बाधक बन हानि पहुॅचाते हैं। इन कीट व्याधियों की रोकथाम हेतु कृषि रक्षा रसायनों का आवश्यकतानुसार प्रयोग करना पड़ता है,फलस्वरूप अधिक व्यय हो जाने के कारण उत्पादन लागत में वृद्धि होती है। बीज बोने व पौधरोपण के पूर्व समय से संस्तुत कृषि रक्षा रसायनों तथा जैविक रसायनों (बायोपेस्टीसाइड्स) से बीजशोधन/भूमिशोधन द्वारा कीट/रोगों की सम्भावित क्षति प्रारम्भ में ही रोककर स्वस्थ फसल से भरपूर गुणवत्तायुक्त उत्पादन प्राप्त होगा फलतः उत्पादन लागत भी कम होगी।
       जिला कृषि रक्षा अधिकारी, विवेक कुमार ने जनपद के किसान भाइयों को सलाह दी है कि वे फसलों में लगने वाले विभिन्न रोगों से बचाव हेतु निम्न विवरण के अनुसार भूमिशोधन/बीजशोधन कार्य करें।
        भूमिगत कीटों दीमक, सफेद गिडार, सूत्रकृमि, जड़ की सूड़ी, कटवर्म, कद्दू का लाल कीड़ा, अर्ली सूट बोरर, लेपीडाप्टेरस कीट तथा मिली बग आदि से रोकथाम हेतु ब्यूवेरिया बैसियाना 1 प्रतिशत 2.5 कि0ग्रा0 अथवा फेनवेलरेट 0.4 प्रतिशत 25 कि0ग्रा0 अथवा क्लोरपाइरीफॉस 20 प्रतिशत 2.5 लीटर अथवा मेटाराइजियम एनीसोप्ली 1.15 प्रतिशत 2.5 कि0ग्रा0 अथवा कार्बोफ्यूरान 3 जी अथवा फोरेट 10 जी 25-30 कि0ग्रा0 प्रति हेक्टेयर के दर से प्रयोग करें।  
        भूमि जनित रोगों जीवाणु झुलसा/पत्तीधारी रोग,फाल्स स्मट/शीथ ब्लाइट, उकठा, रूट राट, स्टेम राट, कॉलर राट, बैक्टीरियल ब्लाइट, डैम्पिंग ऑफ एवम् डाउनी मिल्ड्रयू आदि की रोकथाम जैविक रसायन स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स 0.5 प्रतिशत 2.5 कि0ग्रा0 अथवा ट्राइकोडरमा 2 प्रतिशत 2.5 कि0ग्रा0 प्रति हेक्टेयर के दर से प्रयोग करें।      
       उक्त की अधिक जानकारी हेतु अपने निकटतम कृषि रक्षा इकाई के प्रभारी, किसान सहायक, ए0डी0ओ0(एजी0) या जनपद मुख्यालय पर जिला कृषि रक्षा अधिकारी से सम्पर्क करें।
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