सुबह की पहचान थी जांत की मधुर आवाज

आधुनिकता की दौड़ में खो गया घरेलू श्रम और परंपरा का संगीत

जौनपुर

90 के दशक तक गांवों की सुबह एक खास पहचान के साथ शुरू होती थी। सूरज निकलने से पहले ही घर-घर से “जांत” (हाथ की चक्की) की धीमी लेकिन लयबद्ध आवाज सुनाई देने लगती थी। यह आवाज सिर्फ गेहूं पीसने की नहीं होती थी, बल्कि ग्रामीण जीवन की दिनचर्या, अनुशासन और सामूहिकता की प्रतीक थी। महिलाएं सुबह-सुबह उठकर गेहूं धोतीं, सुखातीं और फिर जांत पर बैठकर आटा पीसती थीं। इसी दौरान लोकगीत गूंजते थे, जिनमें सुख-दुख, जीवन और रिश्तों की झलक मिलती थी। जांत के साथ गीतों की संगत सुबह के वातावरण को जीवंत बना देती थी।
उस समय घर का आटा घर में ही पिसता था, जिसमें शुद्धता और आत्मनिर्भरता दोनों का भाव निहित था। महिलाएं अपनी मेहनत से परिवार के लिए भोजन की तैयारी करती थीं और इस प्रक्रिया में आपसी संवाद, अनुभवों का आदान-प्रदान और सामूहिकता स्वतः बन जाती थी। जांत केवल एक औजार नहीं थी, बल्कि महिलाओं के श्रम, धैर्य और कौशल का प्रतीक थी। 1995 तक अधिकांश गांवों में इसकी आवाज नियमित रूप से सुनाई देती थी, जो ग्रामीण जीवन की पहचान बन चुकी थी।
लेकिन समय के साथ तस्वीर बदलने लगी। आधुनिक युग के आगमन और मशीनों के बढ़ते प्रयोग ने इस परंपरा को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया। बिजली से चलने वाली आटा चक्कियों और मिलों ने हाथ की जांत की जगह ले ली। इससे काम तो आसान हुआ, समय की बचत भी हुई, लेकिन इसके साथ ही वह सामूहिक अनुभव, गीत-संगीत और आत्मीयता कहीं पीछे छूट गई। गांवों की सुबह अब मशीनों की गूंज या सन्नाटे से भरने लगी, जांत की मधुर लय स्मृतियों में सिमटती चली गई।
आज जांत का उपयोग बहुत कम रह गया है। नई पीढ़ी ने इसे केवल किस्सों या बुजुर्गों की यादों में ही जाना है। हालांकि आधुनिक सुविधाएं जीवन को सरल बनाती हैं, परंतु परंपराओं का लुप्त होना सांस्कृतिक क्षति भी है। जांत की आवाज हमें उस दौर की याद दिलाती है, जब जीवन की गति धीमी थी, रिश्ते गहरे थे और श्रम में भी संगीत बसता था। आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी सहेजें, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रह

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